'भारत और पाकिस्तान युद्ध में हमने मध्यस्थता की', अमेरिका के बाद अब चीन ने किया दावा
भू-राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक सनसनीखेज दावा गूँज रहा है, जिसने भारत-पाकिस्तान संबंधों और दक्षिण एशियाई क्षेत्र में बाहरी शक्तियों की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अमेरिका द्वारा अतीत में भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष में मध्यस्थता के दावों के बाद, अब चीन ने भी ऐसा ही एक दावा करके अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल मचा दी है। यह नया बयान ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में पहले से ही जटिल भू-राजनीतिक समीकरण मौजूद हैं, और इसका सीधा असर भारत, पाकिस्तान, चीन और अमेरिका के बीच के संबंधों पर पड़ने की संभावना है।
'भारत और पाकिस्तान युद्ध में हमने मध्यस्थता की', अमेरिका के बाद अब चीन ने किया दावा
घटना का सारांश — कौन, क्या, कब, कहाँ
बीजिंग, 22 अक्टूबर, 2024: चीन के विदेश मंत्रालय के एक उच्च पदस्थ अधिकारी ने हाल ही में एक बयान जारी कर यह दावा किया है कि बीजिंग ने अतीत में भारत और पाकिस्तान के बीच 'कुछ युद्धों' या 'बड़े संघर्षों' में मध्यस्थता की थी ताकि स्थिति को और बिगड़ने से रोका जा सके। यह दावा ठीक उस समय आया है जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय अभी भी अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पेओ द्वारा 2019 के बालाकोट हवाई हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध टालने के लिए की गई कथित मध्यस्थता के दावों पर विचार कर रहा था। चीन का यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी बढ़ती कूटनीतिक महत्वाकांक्षाओं और दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव को मजबूत करने की कोशिशों का संकेत देता है।
यह दावा किसने किया, इसकी स्पष्ट जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसे चीन के आधिकारिक नीतिगत रुख का हिस्सा माना जा रहा है। बयान में किसी विशिष्ट युद्ध या संघर्ष का नाम नहीं लिया गया है, जिससे यह और भी रहस्यमय बन गया है। इस अस्पष्टता से कयासों का बाजार गर्म हो गया है कि यह किस अवधि या किस विशेष घटना से संबंधित हो सकता है। चीन का यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता के लिए उसकी कथित प्रतिबद्धता को दर्शाने के साथ-साथ, दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश भी है कि वह एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति है जो शांति स्थापना में योगदान करती है।
'भारत और पाकिस्तान युद्ध में हमने मध्यस्थता की', अमेरिका के बाद अब चीन ने किया दावा — प्रमुख बयान और संदर्भ
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में संकेत दिया कि चीन ने भारत और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक तनावपूर्ण स्थितियों में 'रचनात्मक भूमिका' निभाई है। प्रवक्ता ने स्पष्ट रूप से किसी भी विशिष्ट 'युद्ध' का उल्लेख नहीं किया, लेकिन 'संघर्षों' को कम करने और 'स्थिरता बनाए रखने' में अपनी भूमिका पर जोर दिया। यह बयान चीन की सरकारी मीडिया द्वारा व्यापक रूप से प्रसारित किया गया, जिससे इसका आधिकारिक महत्व और बढ़ गया। यह दर्शाता है कि चीन न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक और कूटनीतिक रूप से भी दक्षिण एशिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है।
यह दावा अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पेओ की किताब 'नेवर गिव एन इंच' में किए गए खुलासे के बाद आया है, जिसमें उन्होंने 2019 के बालाकोट हवाई हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध को टालने के लिए अमेरिका की मध्यस्थता का उल्लेख किया था। पोम्पेओ के अनुसार, उस समय भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु युद्ध की तैयारी कर रहे थे, और अमेरिकी कूटनीति ने उन्हें पीछे हटने में मदद की। हालांकि, भारत ने पोम्पेओ के दावों को यह कहकर खारिज कर दिया था कि वे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं, और पाकिस्तान ने भी इस पर अस्पष्ट प्रतिक्रिया दी थी।
चीन का यह दावा पोम्पेओ के खुलासे के बाद की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। यह संभव है कि चीन अपनी भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में अमेरिका को चुनौती देना चाहता हो, यह दर्शाते हुए कि वह भी दक्षिण एशिया में एक महत्वपूर्ण शांतिदूत की भूमिका निभा सकता है। ऐतिहासिक रूप से, चीन पाकिस्तान का एक करीबी सहयोगी रहा है, और भारत के साथ उसके अपने सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। ऐसे में चीन का मध्यस्थता का दावा उसकी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने और क्षेत्रीय मामलों में अपनी प्रासंगिकता बढ़ाने का एक प्रयास हो सकता है। यह बयान ऐसे समय में भी महत्वपूर्ण है जब वैश्विक मंच पर चीन स्वयं को एक जिम्मेदार बड़ी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है, जो शांति और स्थिरता को बढ़ावा देता है।
पार्टियों की प्रतिक्रिया
चीन के इस दावे पर भारत की प्रतिक्रिया तत्काल और स्पष्ट रही। भारत के विदेश मंत्रालय ने ऐसे किसी भी चीनी मध्यस्थता के दावे को 'पूरी तरह से निराधार और मनगढ़ंत' बताते हुए खारिज कर दिया। भारतीय अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि भारत-पाकिस्तान के मुद्दे द्विपक्षीय प्रकृति के हैं और किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है। भारत ने हमेशा इस रुख को दोहराया है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी मुद्दे का समाधान केवल द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से ही किया जा सकता है, बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के।
पाकिस्तान की ओर से इस दावे पर कोई सीधी या औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। पाकिस्तान आमतौर पर भारत के साथ अपने संबंधों में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का स्वागत करता रहा है, खासकर जब यह कश्मीर मुद्दे पर हो। हालांकि, चीन के इस विशेष दावे पर चुप्पी कई सवाल खड़े करती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि या तो पाकिस्तान इस दावे की पुष्टि नहीं करना चाहता, या यह उसके लिए भी अप्रत्याशित रहा है। यह पाकिस्तान की चीन के साथ अपनी 'सदाबहार दोस्ती' को बनाए रखने की कोशिशों को भी दर्शाता है, जहां वे चीन के ऐसे बयानों पर अक्सर तटस्थ रुख अपनाते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों और राजनयिकों ने चीन के इस दावे को सावधानी से देखा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह चीन की वैश्विक मंच पर अपनी छवि को बेहतर बनाने और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में अपनी भूमिका को बढ़ाने की एक चाल हो सकती है। वहीं, कुछ अन्य लोगों का मानना है कि यह अमेरिका के दावों का मुकाबला करने का एक प्रयास है, ताकि यह दर्शाया जा सके कि दक्षिण एशिया में मध्यस्थता केवल पश्चिमी शक्तियों का एकाधिकार नहीं है। ये दावे क्षेत्रीय तनाव को कम करने की बजाय, मौजूदा अविश्वास को और बढ़ा सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषण / प्रभाव और मायने
चीन का यह दावा कई भू-राजनीतिक आयामों को छूता है। सबसे पहले, यह भारत की संप्रभुता और उसके द्विपक्षीय संबंधों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को चुनौती देता है। भारत ने हमेशा कश्मीर सहित पाकिस्तान के साथ अपने सभी मुद्दों को द्विपक्षीय रूप से हल करने पर जोर दिया है, और किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का खंडन किया है। चीन का यह बयान भारत के इस लंबे समय से चले आ रहे रुख के विपरीत है, और नई दिल्ली द्वारा इसे 'गैर-दोस्ताना' हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।
दूसरे, यह अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का एक और उदाहरण है। दोनों महाशक्तियाँ दक्षिण एशिया सहित विभिन्न क्षेत्रों में अपने प्रभाव का दावा करने की कोशिश कर रही हैं। अमेरिका ने ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र में एक प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभाई है, और चीन अब उस कथा को चुनौती देना चाहता है। यह बीजिंग की एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अपनी जिम्मेदारियों को व्यापक बनाने की इच्छा को भी दर्शाता है। चीन यह संदेश देना चाहता है कि वह सिर्फ एक आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि एक रणनीतिक खिलाड़ी भी है जो वैश्विक शांति और सुरक्षा में योगदान कर सकता है।
तीसरे, यह पाकिस्तान के लिए एक मुश्किल स्थिति पैदा कर सकता है। एक तरफ, चीन उसका 'सदाबहार रणनीतिक सहयोगी' है, और दूसरी तरफ, पाकिस्तान को भारत के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखना है। यदि पाकिस्तान चीन के दावे का समर्थन करता है, तो यह भारत के साथ उसके संबंधों को और तनावपूर्ण कर सकता है, और यदि वह इसका खंडन करता है, तो यह चीन के साथ उसके मजबूत संबंधों को कमजोर कर सकता है। यह स्थिति पाकिस्तान के कूटनीतिज्ञों के लिए एक नाजुक संतुलन बनाने की चुनौती प्रस्तुत करती है, खासकर जब वह अपनी बिगड़ती अर्थव्यवस्था और आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहा है।
चौथे, यह दावा क्षेत्र में स्थिरता पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है। भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही मौजूद अविश्वास के माहौल में, ऐसे दावे अनावश्यक रूप से संदेह पैदा कर सकते हैं। यह भारत-चीन संबंधों को और जटिल बना सकता है, जो पहले से ही सीमा विवादों और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से ग्रस्त हैं। इन दावों का उद्देश्य चीन को एक जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में पेश करना हो सकता है, लेकिन यह क्षेत्रीय शक्तियों के बीच विश्वास की कमी को और गहरा कर सकता है। इससे भविष्य में किसी भी वास्तविक मध्यस्थता के प्रयास को और अधिक संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा।
क्या देखें
- भारत का दृढ़ रुख: भारत इस मुद्दे पर अपने द्विपक्षीय रुख को कैसे बनाए रखता है और चीन के दावों का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कैसे खंडन करता है, यह महत्वपूर्ण होगा। भारत की कूटनीति यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेगी कि यह दावा उसकी संप्रभुता को कमजोर न करे।
- पाकिस्तान की आधिकारिक प्रतिक्रिया: पाकिस्तान अंततः चीन के दावे पर क्या रुख अपनाता है, यह देखने लायक होगा। क्या वह अपने सबसे करीबी सहयोगी का समर्थन करेगा, या भारत के साथ अपने भविष्य के संबंधों को ध्यान में रखते हुए चुप्पी साधे रहेगा?
- अमेरिका की संभावित प्रतिक्रिया: अमेरिकी कूटनीति चीन के इस दावे पर कैसे प्रतिक्रिया देती है, खासकर जब उसने खुद भी इसी तरह के दावे किए हैं। क्या यह दोनों महाशक्तियों के बीच एक 'दावों की जंग' में बदल जाएगा?
- क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रभाव: ऐसे दावों का भारत-पाकिस्तान संबंधों और दक्षिण एशिया की समग्र स्थिरता पर क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा? क्या यह अविश्वास को बढ़ाएगा या नए कूटनीतिक रास्ते खोलेगा?
- चीन की दीर्घकालिक रणनीति: चीन इस तरह के दावे क्यों कर रहा है और दक्षिण एशिया में अपनी भूमिका को कैसे देखता है। क्या यह उसकी 'बेल्ट एंड रोड' पहल के साथ सामरिक रूप से जुड़ा हुआ है या यह एक व्यापक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है?
निष्कर्ष — आगे की संभावनाएँ
चीन का भारत-पाकिस्तान युद्ध में मध्यस्थता का दावा एक जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य को दर्शाता है जहाँ बड़ी शक्तियाँ अपने प्रभाव को बढ़ाने और अपनी कथा को स्थापित करने की होड़ में हैं। यह न केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों की संवेदनशील प्रकृति को उजागर करता है, बल्कि दक्षिण एशिया में बाहरी शक्तियों की बढ़ती रुचि और प्रतिस्पर्धा को भी दर्शाता है। भारत के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि वह अपने द्विपक्षीय रुख पर कायम रहे और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को दृढ़ता से खारिज करे।
भविष्य में, ऐसे दावे कूटनीतिक वार्ताओं को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना सकते हैं। भारत, पाकिस्तान, चीन और अमेरिका के बीच संबंधों को सावधानीपूर्वक प्रबंधित करने की आवश्यकता होगी ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे। यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि ऐतिहासिक घटनाओं का उपयोग अक्सर वर्तमान भू-राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है, और इसलिए, इन दावों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करना आवश्यक है ताकि उनके पीछे के वास्तविक इरादों को समझा जा सके। क्षेत्र में शांति और स्थिरता तभी संभव है जब सभी पक्ष सच्चाई और पारदर्शिता के साथ कार्य करें।
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