ईरान-अमेरिका तनाव: डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी के बदले मिली तगड़ी धमकी, ईरान ने ऐसे किया 'जवाबी हमला'
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में तनाव और बयानबाजी का दौर कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब विश्व की दो शक्तिशाली शक्तियाँ आमने-सामने हों, तो दुनिया भर में चिंताएँ बढ़ जाती हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच अक्सर जुबानी जंग देखने को मिली है, जिसने वैश्विक सुरक्षा और स्थिरता के लिए गंभीर निहितार्थ पैदा किए हैं। इसी क्रम में, ट्रंप की एक चेतावनी के बाद ईरान ने जिस तरह से 'हिट बैक' किया, उसने एक बार फिर मध्य पूर्व की स्थिति को गर्मा दिया। यह घटनाक्रम ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और क्षेत्रीय समीकरणों के बीच और भी जटिल हो गया।
ईरान-अमेरिका तनाव: डोनाल्ड ट्रंप को चेतावनी के बदले मिली तगड़ी धमकी, जानें ईरान ने कैसे किया 'जवाबी हमला'
घटना का सारांश — कौन, क्या, कब, कहाँ
नई दिल्ली, 15 फरवरी, 2020: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव कई बार खुले टकराव की स्थिति तक पहुँच चुका है। 2020 की शुरुआत में, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को 'निशाना बनाने' की चेतावनी दी थी, खासकर जब ईरान ने कथित तौर पर अमेरिकी हितों के खिलाफ किसी भी कार्रवाई की योजना बनाई थी। यह चेतावनी तब आई थी जब ईरान में आंतरिक विरोध प्रदर्शनों का एक सिलसिला चल रहा था, और ईरानी नेतृत्व पर अंदरूनी और बाहरी दोनों तरफ से दबाव बढ़ रहा था।
ट्रंप के बयानों के तुरंत बाद, ईरान ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी। ईरानी अधिकारियों ने अमेरिकी धमकियों को खारिज करते हुए खुद के बचाव का संकल्प लिया और अमेरिका को 'गंभीर परिणाम' भुगतने की चेतावनी दी। ईरान ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी आक्रामकता का तुरंत और निर्णायक रूप से जवाब देगा। यह बयानबाजी ऐसे समय में हुई जब दोनों देशों के बीच पहले से ही परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय प्रॉक्सी युद्धों को लेकर गहरा मतभेद था।
Iran Protest Live: डोनाल्ड ट्रंप को चेतावनी के बदले मिली तगड़ी धमकी, जानें ईरान ने कैसे किया 'हिट बैक' — प्रमुख बयान और संदर्भ
ट्रंप प्रशासन ने 2018 में ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से एकतरफा हटने के बाद ईरान पर 'अधिकतम दबाव' की नीति अपनाई थी। इसके तहत ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई और देश में व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इन विरोध प्रदर्शनों को अमेरिका और पश्चिमी देशों ने समर्थन दिया, जिससे ईरानी शासन पर और दबाव बढ़ गया। ट्रंप ने अक्सर सोशल मीडिया पर ईरान को चेतावनी दी और कहा कि अगर ईरान ने अमेरिकी कर्मियों या संपत्तियों को निशाना बनाया तो उसे 'बहुत बड़ी कीमत' चुकानी पड़ेगी।
ईरान ने इन चेतावनियों का जवाब अपनी 'रेसिस्टेंस इकोनॉमी' (प्रतिरोध अर्थव्यवस्था) और सैन्य क्षमता को मजबूत करके दिया। सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई ने ट्रंप की धमकियों को 'बेतुका' और 'खाली बयानबाजी' करार दिया। उन्होंने कहा कि ईरान किसी भी विदेशी हस्तक्षेप का डटकर मुकाबला करेगा। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडरों ने भी कई बार यह दावा किया कि वे अमेरिकी सेना को क्षेत्र से बाहर निकालने में सक्षम हैं और उनके पास ऐसे हथियार हैं जो अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना सकते हैं।
ईरान ने 'हिट बैक' करने के कई तरीके अपनाए। इनमें से एक तरीका था अपने मिसाइल कार्यक्रमों का प्रदर्शन जारी रखना। ईरान ने कई बार अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण किया, जिनकी मारक क्षमता इजरायल और खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों तक पहुँच सकती थी। यह स्पष्ट रूप से अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए एक चेतावनी थी। इसके अलावा, ईरान ने क्षेत्र में अपने प्रॉक्सी बलों का समर्थन जारी रखा, जैसे कि यमन में हूती विद्रोही, लेबनान में हिजबुल्लाह और इराक में शिया मिलिशिया। इन समूहों के माध्यम से अमेरिका और उसके सहयोगियों के हितों को परोक्ष रूप से चुनौती दी गई।
ईरान ने अपनी परमाणु गतिविधियों को भी तेज किया, जिसमें यूरेनियम संवर्धन की सीमा को बढ़ाना शामिल था, जो परमाणु समझौते के तहत निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन था। यह कदम अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संकेत देने के लिए था कि यदि प्रतिबंध नहीं हटाए गए तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में संकोच नहीं करेगा। इन सब के बीच, ईरान में 'लाइव' विरोध प्रदर्शनों ने सरकार पर और भी दबाव बढ़ा दिया था, और शासन ने इन विरोधों को विदेशी ताकतों द्वारा 'उकसाया' हुआ बताकर दबाने की कोशिश की।
इस दौरान, ईरानी विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने भी अमेरिकी नीतियों की तीखी आलोचना की और कहा कि 'क्षेत्र में अमेरिकी उपस्थिति ही अस्थिरता का कारण है।' उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका की एकतरफा नीतियों के खिलाफ लगातार आवाज उठाई। ईरान ने क्षेत्रीय स्तर पर अपने रणनीतिक साझेदारों, जैसे रूस और चीन, के साथ संबंधों को मजबूत करने की कोशिश की, ताकि अमेरिकी दबाव का सामना किया जा सके। कुल मिलाकर, ईरान ने एक बहु-आयामी रणनीति अपनाई जिसमें सैन्य धमकियाँ, परमाणु कार्यक्रम का विस्तार, क्षेत्रीय प्रॉक्सी का उपयोग और राजनयिक आलोचना शामिल थी, ताकि वह अमेरिकी चेतावनियों का जवाब दे सके।
पार्टियों की प्रतिक्रिया
अमेरिका के भीतर, डोनाल्ड ट्रंप की 'अधिकतम दबाव' की नीति को रिपब्लिकन पार्टी के भीतर व्यापक समर्थन मिला, जिन्होंने ईरान को एक क्षेत्रीय खतरा माना। हालांकि, डेमोक्रेटिक पार्टी के कई सदस्यों और विश्लेषकों ने इस नीति की आलोचना की, यह तर्क देते हुए कि इससे केवल तनाव बढ़ेगा और कूटनीति के रास्ते बंद हो जाएंगे। उनका मानना था कि परमाणु समझौते से हटने का निर्णय एक गलती थी जिससे ईरान और भी आक्रामक हो गया।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, यूरोपीय संघ (EU) के देश, जिन्होंने ईरान परमाणु समझौते का समर्थन किया था, ने अमेरिका और ईरान दोनों से संयम बरतने का आग्रह किया। उन्होंने तनाव कम करने और कूटनीति के माध्यम से मुद्दों को हल करने के लिए कई प्रयास किए। फ्रांस, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों ने ईरान को समझौते का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया और अमेरिका से प्रतिबंधों में ढील देने का अनुरोध किया।
रूस और चीन ने ईरान के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया और अमेरिकी प्रतिबंधों की आलोचना की। उन्होंने ईरान के संप्रभुता के अधिकार का समर्थन किया और जोर देकर कहा कि परमाणु समझौते को बरकरार रखा जाना चाहिए। मध्य पूर्व में, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे अमेरिकी सहयोगियों ने ट्रंप की ईरान विरोधी नीति का समर्थन किया, जबकि कतर और ओमान जैसे देशों ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कोशिश की।
ईरानी सरकार के भीतर, सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और IRGC ने ट्रंप की धमकियों का दृढ़ता से मुकाबला करने की नीति का समर्थन किया। राष्ट्रपति हसन रूहानी जैसे अधिक उदारवादी नेताओं ने भी राष्ट्रीय एकता का आह्वान किया, हालांकि वे बाहरी दुनिया के साथ अधिक कूटनीतिक रास्ते खोजने के पक्ष में थे। आंतरिक विरोध प्रदर्शनों के बावजूद, ईरानी शासन ने एक एकजुट बाहरी चेहरा पेश करने की कोशिश की, जिसमें उसने अमेरिकी धमकियों को 'राष्ट्रीय संप्रभुता पर हमला' बताया।
राजनीतिक विश्लेषण / प्रभाव और मायने
डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी और ईरान की जवाबी धमकी ने मध्य पूर्व को एक अस्थिर स्थिति में धकेल दिया। 'अधिकतम दबाव' की अमेरिकी नीति ने ईरान को अलग-थलग करने के बजाय उसे और अधिक आक्रामक बना दिया। ईरान ने प्रतिबंधों के बावजूद अपनी परमाणु क्षमताओं और क्षेत्रीय प्रभाव को मजबूत करने की कोशिश की, जिससे क्षेत्रीय संघर्षों के बढ़ने का खतरा बढ़ गया।
इस तनाव का एक बड़ा प्रभाव वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ा, क्योंकि फारस की खाड़ी में किसी भी सैन्य टकराव से तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती थी। इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया। ईरान में आंतरिक विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए शासन ने बाहरी खतरे की धारणा का इस्तेमाल किया, जिससे उसकी वैधता को बल मिला और जनता का ध्यान घरेलू समस्याओं से हटकर विदेशी हस्तक्षेप पर केंद्रित हो गया।
इस दौरान, अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी, जैसे कि यूरोपीय देश, अमेरिका से दूर होते दिखे, क्योंकि वे ईरान के साथ परमाणु समझौते को बचाना चाहते थे। इसने वैश्विक स्तर पर अमेरिकी नेतृत्व की विश्वसनीयता को भी चुनौती दी। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव ने क्षेत्रीय शक्तियों, जैसे इजरायल और सऊदी अरब, को अपनी सुरक्षा के बारे में अधिक चिंतित कर दिया, जिससे क्षेत्र में सैन्यीकरण और हथियारों की होड़ में वृद्धि हुई।
संक्षेप में, यह घटनाक्रम न केवल दो देशों के बीच एक साधारण जुबानी जंग थी, बल्कि यह जटिल भू-राजनीतिक दांवपेंच का हिस्सा थी, जिसने मध्य पूर्व और उससे आगे के भविष्य को आकार दिया। इसने यह भी दिखाया कि कैसे एकतरफा नीतियां हमेशा वांछित परिणाम नहीं देतीं और अक्सर अनपेक्षित परिणामों को जन्म देती हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय संबंध और अधिक जटिल हो जाते हैं।
क्या देखें
- परमाणु वार्ता का भविष्य: क्या ईरान और पश्चिमी शक्तियों के बीच परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने के लिए कोई नई वार्ता शुरू होगी? यह तनाव कम करने की कुंजी हो सकती है।
- क्षेत्रीय प्रॉक्सी की भूमिका: ईरान अपने क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों (जैसे हिजबुल्लाह, हूती) का उपयोग कैसे जारी रखता है, और क्या वे अमेरिकी और सहयोगी हितों को चुनौती देना जारी रखेंगे।
- आंतरिक ईरानी स्थिरता: ईरान में आंतरिक विरोध प्रदर्शनों का भविष्य क्या है? क्या वे शासन पर दबाव बनाना जारी रखेंगे, और शासन उनसे कैसे निपटेगा।
- अमेरिकी नीति में बदलाव: अमेरिका में नए प्रशासन के तहत ईरान के प्रति नीति में क्या बदलाव आते हैं? क्या कूटनीति की दिशा में कोई नया कदम उठाया जाएगा।
- खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा: फारस की खाड़ी में नौवहन सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता कैसे प्रभावित होती है? क्या कोई नया सैन्य टकराव हो सकता है?
निष्कर्ष — आगे की संभावनाएँ
डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी के जवाब में ईरान की दृढ़ प्रतिक्रिया ने दर्शाया कि ईरान अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं है। यह घटनाक्रम अमेरिका-ईरान संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने दोनों देशों के बीच अविश्वास और शत्रुता को और गहरा किया। इसने यह भी उजागर किया कि कैसे घरेलू चुनौतियाँ और भू-राजनीतिक तनाव एक दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं।
भविष्य में, अमेरिका और ईरान के बीच संबंध अप्रत्याशित बने रहेंगे। कूटनीति का मार्ग हमेशा खुला रहता है, लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों से महत्वपूर्ण रियायतों और भरोसे की बहाली की आवश्यकता होगी। जब तक यह भरोसा कायम नहीं होता, तब तक मध्य पूर्व में अस्थिरता और तनाव का खतरा बना रहेगा, और विश्व को इन दोनों शक्तिशाली राष्ट्रों के बीच के जटिल संबंध पर बारीक नजर रखनी होगी। यह देखना बाकी है कि क्या दोनों देश तनाव कम करने के लिए कोई सामान्य आधार खोज पाएंगे या यह टकराव और गहराता जाएगा।
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